Wednesday, January 12, 2011

बिकाऊ है भारत सरकार, बोलो खरीदोगे ?

90 के दशक के अंत में आयकर विभाग ने कई बहुराष्ट्रीय
कंपनियों का सर्वे किया। सर्वे में ये कंपनियां रंगे हाथों टैक्स की चोरी करते पायी
गयीं, उन्होंने सीधे अपना जुर्म कबूल किया और बिना कोई अपील किये सारा टैक्स जमा कर
दिया। अगर ये लोग किसी और देश में होते तो अभी तक उनके वरिष्ठ अधिकारियों को जेल
भेज दिया गया होता। ऐसी ही एक कम्पनी पर सर्वे के दौरान उस कम्पनी के विदेशी मुखिया
ने आयकर टीम को धमकी दी – ‘‘भारत एक बहुत गरीब देश है। हम आपके देश में आपकी मदद
करने आये हैं।
आपको पता नहीं हम कितने ताकतवर हैं। हम
चाहें तो आपकी संसद से कोई भी कानून पारित करा सकते हैं। हम आप लोगों का तबादला भी
करा सकते हैं।’’ इसके कुछ दिन बाद ही इस आयकर टीम के एक हेड का तबादला कर दिया
गया।

उस वक्त विदेशी की
बातों पर ज्यादा गौर नहीं किया। सोचा कि शायद वो आयकर सर्वे से परेशान होकर बोल रहा
था, लेकिन पिछले कुछ सालों से धीरे-धीरे उसकी बातों में सच्चाई नजर आने लगी
है।

जुलाई 2008 में
यू.पी.ए. सरकार को संसद में अपना बहुमत साबित करना था। खुलेआम सांसदों की
खरीद-फरोख्त चल रही थी। कुछ टी.वी. चैनलों ने सांसदों को पैसे लेकर खुलेआम बिकते
दिखाया। उन तस्वीरों ने इस देश की आत्मा को हिला दिया। अगर सांसद इस तरह से बिक
सकते हैं तो हमारे वोट की क्या कीमत रह जाती है।
जिस किसी सांसद को वोट करे,  जीतने के बाद वह पैसे के लिए किसी भी पार्टी में जा सकता
है। दूसरे, आज अपनी सरकार बचाने के लिए इस देश की एक पार्टी उन्हें खरीद रही है। कल
को उन्हें कोई और देश भी खरीद सकता है। जैसे अमरीका, पाकिस्तान इत्यादि। हो सकता है
ऐसा हो भी रहा हो, किसे पता? यह सोच कर पूरे शरीर में सिहरन दौड़ पड़ी- क्या हम एक
आजाद देश के नागरिक हैं? क्या हमारे देश की संसद सभी कानून इस देश के लोगों के हित
के लिए ही बनाती है?

अभी कुछ दिन पहले जब अखबारों में संसद
में हाल ही में प्रस्तुत न्यूक्लीयर सिविल लायबिलिटी बिल के बारे में पढ़ा तो सभी
डर सच साबित होते नजर आने लगे। यह बिल कहता है कि कोई विदेशी कम्पनी भारत में अगर
कोई परमाणु संयंत्र लगाती है और यदि उस संयंत्र में कोई दुर्घटना हो जाती है तो उस
कम्पनी की जिम्मेदारी केवल 1500 करोड़ रुपये तक की होगी। दुनियाभर में जब भी कभी
परमाणु हादसा हुआ तो हजारों लोगों की जान गयी और हजारों करोड़ का नुकसान
हुआ।

भोपाल गैस त्रासदी
में ही पीड़ित लोगों को अभी तक 2200 करोड़ रुपया मिला है जो कि काफी कम माना जा रहा
है। ऐसे में 1500 करोड़ रुपये तो कुछ भी नहीं होते। एक परमाणु हादसा न जाने कितने
भोपाल के बराबर होगा? इसी बिल में आगे लिखा है कि उस कम्पनी के खिलाफ कोई आपराधिक
मामला भी दर्ज नहीं किया जायेगा और कोई मुकदमा नहीं चलाया जायेगा। कोई पुलिस केस भी
नहीं होगा। बस 1500 करोड़ रुपये लेकर उस कम्पनी को छोड़ दिया
जायेगा।

यह कानून पढ़कर
ऐसा लगता है कि इस देश के लोगों की जिन्दगियों को कौड़ियों के भाव बेचा जा रहा है।
साफ-साफ जाहिर है कि यह कानून इस देश के लोगों की
जिन्दगियों को दांव पर लगाकर विदेशी कम्पनियों को फायदा पहुंचाने के लिए किया जा
रहा है। हमारी संसद ऐसा क्यों कर रही है? यकीनन या तो हमारे सांसदों पर किसी तरह का
दबाव है या कुछ सांसद या पार्टियां विदेशी कम्पनियों के हाथों बिक गयी
हैं।

भोपाल गैस त्रासदी
के हाल ही के निर्णय के बाद अखबारों में ढेरों खबरें छप रही हैं कि किस तरह भोपाल
के लोगों के हत्यारे को हमारे देश के उच्च नेताओं ने भोपाल त्रासदी के कुछ दिनों के
बाद ही राज्य अतिथि सा सम्मान दिया था और उसे भारत से भागने में पूरी मदद की
थी।

इस सब बातों को
देखकर मन में प्रश्न खड़े होते हैं—क्या भारत सुरक्षित हाथों में है? क्या हम अपनी
जिन्दगी और अपना भविष्य इन कुछ नेताओं और अधिकारियों के हाथों में सुरक्षित देखते
हैं?